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रायपुर :गणपती उत्सव की तैयारी जोरों पर ,मॉडल्स क्लब द्वारा राम सेतु थीम पर आधारित झांकी होगी आकर्षण

 

मृत्युंजय निर्मलकर ,रायपुर:छत्तीसगढ के राजधानी रायपुर में हर साल की तरह इस साल भी गणपति उत्सव मनाए जाने की तैयारी जोर शोर से शुरू हो चुकी हैं। जहा सभी गणेश पंडालों में गणपती बप्पा की मूर्ति पूजा के लिए गणेश की मूर्ति हेतु ऑर्डर भी दिया जा चुका है । मूर्ति की साइज की बात करे तो इस बार 7 फीट से लेकर विशालकाय 15 फीट तक मूर्ति शहरवासियों को देखने मिलेगी । इसी प्रकार टिकरापारा , मठपारा में भी गणेश पूजा की तैयारी जोरों पर है। इसी प्रकार मठपारा के मॉडल्स क्लब के द्वारा प्रतिवर्ष अनुसार इस वर्ष भी गणेश मूर्ति स्थापित की जाएगी।

कब से हो रही है गणेश उत्सव की शुरुआत

इस साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की गणेश चतुर्थी 19 सितंबर 2023 को है। इसी दिन से गणेश चतुर्थी की शुरुआत हो रही है। वहीं इसका समापन 28 सितंबर 2023 को अनंत चतुर्थी वाले दिन होगा। इसी दिन बप्पा की मूर्ति का विसर्जन होता है।

मॉडल्स क्लब समिति के अध्यक्ष रॉकी साहू ने बताया समिति हर वर्ष अलग अलग झांकी स्थापित करती है साथ ही इस वर्ष समिति के द्वारा अलग ही उत्साह है। यहां गणपती की विशाल भव्य मूर्ति तो स्थापित की ही जा रही है साथ ही विशेष झांकी भी स्थापित करने की तैयारी की जा रही है। जिसमे प्रभु श्री राम के रामायण से प्रेरित होकर राम सेतु झांकी स्थापित की जाएगी। जिसमे शहर वासियों को राम भगवान द्वारा लंका विजय हेतु राम सेतु बनाए जाने की प्रति मूर्ति बनाया गया है। उन्होंने कहा जिस प्रकार श्री राम जी ने समुद्र में सेतु बनाया और लंका विजय की और समाज में आदर्श स्थापित किया । इसी संदेश को लेकर समिति गणेश उत्सव में मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु राम की संदेश को बताना चाहती है।

इस बारे में आगे बताते हुए समिति के सदस्य केशव मानिकपुरी ने बताया कि इस साल गणेश पूजा खास होने जा रहा है ।बीते कुछ वर्ष पहले कोरोना काल के समय विकट परिस्थिति की वजह से शासन प्रशासन ने गाइड लाइन जारी की हुई । जिससे गणपती उत्सव में मूर्ति की ऊंचाई को लेकर और पंडालों में भीड़ भी कम होती थी। जिसका असर बप्पा के पूजा में भी नजर आता था परंतु इस वर्ष जब सभी चीजे सामान्य है । जिससे युवाओं में जोश भी देखा जा रहा है। इस साल गणपती उत्सव के लिए समिति भव्य झांकी बना रही है। इसके लिए 15 दिन पहले ही पंडाल से लेकर सभी तैयारी करने वाले है । गणपती उत्सव एक ऐसा उत्सव है जो देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है इस अवसर पर सभी एकसाथ बिना किसी भेद भाव के मिल जुल कर गणपती उत्सव मनाते है। 

समिति द्वारा पहले दिन से लेकर अंतिम दिन गणेश उत्सव को खास बनाए जाने के लिए रूप रेखा तैयार की जा चुकी है। देश प्रदेश में प्रसिद्ध Dj स्वरमाला साऊंड सिस्टम सेटअप विसर्जन के लिए एडवांस बुक किया गया है जो अलग ही जलवा बिखेरेगी । 

क्या है रामसेतु?

रामसेतु, जिसे एडम ब्रिज के नाम से भी जाना जाता है, भारत के दक्षिण-पूर्वी तट पर रामेश्वरम और श्रीलंका के उत्तर-पश्चिमी तट के पास मन्नार द्वीप के बीच चूना पत्थर की 48 किलोमीटर की रेंज है. इस ब्रिज की खास बात ये है कि हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों की पौराणिक कथाओं में इसका इस सेतु का जिक्र किया गया है. जहां एक तरफ हिंदुओं का मानना है कि यह भगवान राम और उनकी सेना द्वारा लंका पार करने और रावण से लड़ने के लिए बनाया गया पुल (सेतु) है, वहीं इस्लामिक कथाओं के अनुसार, एडम ने इस पुल का उपयोग आदम की चोटी तक पहुंचने के लिए किया था. जहां वह एक पैर पर 1,000 वर्षों तक पश्चाताप में खड़ा रहा।

आओ जानते हैं कि राम सेतु के 10 रोचक तथ्‍य।

1.भारत के दक्षिण में धनुषकोटि तथा श्रीलंका के उत्तर पश्चिम में पम्बन के मध्य समुद्र में 48 किमी चौड़ी पट्टी के रूप में उभरे एक भू-भाग के उपग्रह से खींचे गए चित्रों को अमेरिकी अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (नासा) ने जब 1993 में दुनिया भर में जारी किया तो भारत में इसे लेकर राजनीतिक वाद-विवाद का जन्म हो गया था। इस पुल जैसे भू-भाग को राम का पुल या रामसेतु कहा जाने लगा।

रामसेतु का चित्र नासा ने 14 दिसम्बर 1966 को जेमिनी-11 से अंतरिक्ष से प्राप्त किया था। इसके 22 साल बाद आई.एस.एस 1 ए ने तमिलनाडु तट पर स्थित रामेश्वरम और जाफना द्वीपों के बीच समुद्र के भीतर भूमि-भाग का पता लगाया और उसका चित्र लिया। इससे अमेरिकी उपग्रह के चित्र की पुष्टि हुई।

2. दिसंबर 1917 में साइंस चैनल पर एक अमेरिकी टीवी शो “एनशिएंट लैंड ब्रिज” में अमेरिकी पुरात्वविदों ने वैज्ञानिक जांच के आधार पर यह कहा था कि भगवान राम के श्रीलंका तक सेतु बनाने की हिंदू पौराणिक कथा सच हो सकती है। भारत और श्रीलंका के बीच 50 किलोमीटर लंबी एक रेखा चट्टानों से बनी है और ये चट्टानें सात हजार साल पुरानी हैं जबकि जिस बालू पर ये चट्टानें टिकी हैं, वह चार हजार साल पुराना है।नासा की सेटेलाइट तस्वीरों और अन्य प्रमाणों के साथ विशेषज्ञ कहते हैं कि चट्टानों और बालू की उम्र में यह विसंगति बताती है कि इस पुल को इंसानों ने बनाया होगा।

3. इस पुल जैसे भू-भाग को राम का पुल या रामसेतु कहा जाने लगा। सबसे पहले श्रीलंका के मुसलमानों ने इसे आदम पुल कहना शुरू किया था। फिर ईसाई या पश्चिमी लोग इसे एडम ब्रिज कहने लगे। वे मानते हैं कि आदम इस पुल से होकर गुजरे थे।

4. रामसेतु पर कई शोध हुए हैं कहा जाता है कि 15वीं शताब्दी तक इस पुल पर चलकर रामेश्वरम से मन्नार द्वीप तक जाया जा सकता था, लेकिन तूफानों ने यहां समुद्र को कुछ गहरा कर दिया। 1480 ईस्वी सन् में यह चक्रवात के कारण टूट गया और समुद्र का जल स्तर बढ़ने के कारण यह डूब गया।

5. वाल्मीकि रामायण कहता है कि जब श्रीराम ने सीता को लंकापति रावण से छुड़ाने के लिए लंका द्वीप पर चढ़ाई की, तो उस वक्त उन्होंने विश्वकर्मा के पुत्र नल और नील से एक सेतु बनवाया था जिसे बनाने में वानर सेना से सहायता की थी। इस सेतु में पानी में तैरने वाले पत्थरों का उपयोग किया गया था जो कि किसी अन्य जगह से लाए गए थे। कहते हैं कि ज्वालामुखी से उत्पन्न पत्‍थर पानी में नहीं डूबते हैं। संभवत: इन्हीं पत्‍थरों का उपयोग किया गया होगा।

6. भगवान राम ने जहां धनुष मारा था उस स्थान को ‘धनुषकोटि’ कहते हैं। राम ने अपनी सेना के साथ लंका पर चढ़ाई करने के लिए उक्त स्थान से समुद्र में एक ब्रिज बनाया था इसका उल्लेख ‘वाल्मिकी रामायण’ में मिलता है। श्रीराम ने इसे सतु का नाम नल सेतु रखा था। वाल्मीक रामायण में वर्णन मिलता है कि पुल लगभग पांच दिनों में बन गया जिसकी लम्बाई सौ योजन और चौड़ाई दस योजन थी।रामायण में इस पुल को ‘नल सेतु’ की संज्ञा दी गई है। नल के निरीक्षण में वानरों ने बहुत प्रयत्न पूर्वक इस सेतु का निर्माण किया था।

7. वाल्मीक रामायण में कई प्रमाण हैं कि सेतु बनाने में उच्च तकनीक प्रयोग किया गया था। कुछ वानर बड़े-बड़े पर्वतों को यन्त्रों के द्वारा समुद्रतट पर ले आए ते। कुछ वानर सौ योजन लम्बा सूत पकड़े हुए थे, अर्थात पुल का निर्माण सूत से सीध में हो रहा था।

8. वाल्मीकि रामायण के अलावा कालिदास ने ‘रघुवंश’ के तेरहवें सर्ग में राम के आकाश मार्ग से लौटने का वर्णन किया है। इस सर्ग में राम द्वारा सीता को रामसेतु के बारे में बताने का वर्णन है। यह सेतु कालांतर में समुद्री तूफानों आदि की चोटें खाकर टूट गया था। अंन्य ग्रंथों में कालीदास की रघुवंश में सेतु का वर्णन है। स्कंद पुराण (तृतीय, 1.2.1-114), विष्णु पुराण (चतुर्थ, 4.40-49), अग्नि पुराण (पंचम-एकादश) और ब्रह्म पुराण (138.1-40) में भी श्रीराम के सेतु का जिक्र किया गया है।

9. वाल्मीकि के अनुसार तीन दिन की खोजबीन के बाद श्रीराम ने रामेश्वरम के आगे समुद्र में वह स्थान ढूंढ़ निकाला, जहां से आसानी से श्रीलंका पहुंचा जा सकता हो। उन्होंने नल और नील की मदद से उक्त स्थान से लंका तक का पुनर्निर्माण करने का फैसला लिया। धनुषकोडी भारत के तमिलनाडु राज्‍य के पूर्वी तट पर रामेश्वरम द्वीप के दक्षिणी किनारे पर स्थित एक गांव है। धनुषकोडी पंबन के दक्षिण-पूर्व में स्थित है। धनुषकोडी श्रीलंका में तलैमन्‍नार से करीब 18 मील पश्‍चिम में है।

10. इसका नाम धनुषकोडी इसलिए है कि यहां से श्रीलंका तक वानर सेना के माध्यम से नल और नील ने जो पुल (रामसेतु) बनाया था उसका आकार मार्ग धनुष के समान ही है। इन पूरे इलाकों को मन्नार समुद्री क्षेत्र के अंतर्गत माना जाता है। धनुषकोडी ही भारत और श्रीलंका के बीच एकमात्र स्‍थलीय सीमा है, जहां समुद्र नदी की गहराई जितना है जिसमें कहीं-कहीं भूमि नजर आती है।

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