Uttar Pradesh

कुरुक्षेत्र में किसान को बड़ी राहत, फसल बीमा क्लेम नहीं देने पर बैंक और बीमा कंपनी को ₹43,870 मुआवजे का आदेश

 कुरुक्षेत्र
 प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में गेहूं की फसल का बीमा करवाने के बावजूद क्लेम नहीं मिलने पर गांव बसंतपुर की किसान अमरजीत कौर को जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग से राहत मिली है। आयोग ने बीमा कंपनी और बैंक की लापरवाही को सेवा में कमी मानते हुए दोनों को संयुक्त रूप से किसान को 43,870 रुपये मुआवजा देने के आदेश दिए हैं।

इसके साथ ही मानसिक परेशानी के लिए 10 हजार रुपये और कानूनी खर्च के रूप में पांच हजार रुपये भी देने होंगे। मुआवजे की राशि पर शिकायत दायर करने की तारीख से भुगतान होने तक सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा। आयोग ने सभी निर्धारित राशियों का भुगतान 45 दिन के भीतर करने के निर्देश दिए हैं।

तीन एकड़ गेहूं की फसल को हुआ था नुकसान
बसंतपुर निवासी अमरजीत कौर ने आयोग में शिकायत दर्ज करवाई थी कि उनके पास गांव में तीन एकड़ कृषि भूमि है। उन्होंने रबी सीजन 2021-22 में तीन एकड़ में गेहूं की फसल बोई थी और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत बीमा करवाया था।

इसके लिए उनके बैंक खाते से 1,202.92 रुपये प्रीमियम काटा गया था। मार्च 2022 में भारी बारिश के कारण फसल को नुकसान पहुंचा। इसके बाद कृषि विभाग की टीम ने खेतों का निरीक्षण किया और फसल नुकसान 58.52 प्रतिशत आंका।

इसके बावजूद किसान को बीमा क्लेम नहीं मिला। बार-बार चक्कर लगाने के बाद भी राहत नहीं मिलने पर उन्होंने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।

पोर्टल पर विवरण अपलोड नहीं करने का दिया तर्क
मामले में बीमा कंपनी ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि बैंक ने किसान के आवेदन के साथ जरूरी यूटीआर नंबर राष्ट्रीय फसल बीमा पोर्टल पर अपलोड नहीं किया था। इस कारण आवेदन का स्टेटस फ्रेश/अनपेड रहा। कंपनी के अनुसार, 2,63,443.21 रुपये की समेकित प्रीमियम राशि 24 अगस्त 2022 को बैंक को वापस कर दी गई थी।

वहीं, बैंक ने दलील दी कि उसने प्रीमियम बीमा कंपनी को भेज दिया था और क्लेम देने की जिम्मेदारी बीमा कंपनी की थी। कृषि विभाग ने भी अपने रिकार्ड में फसल नुकसान का आंकलन किए जाने की पुष्टि की।

किसान की गलती नहीं, दोनों की जिम्मेदारी
आयोग की अध्यक्ष नीलम कश्यप तथा सदस्य नीलम और सुनील मोहन त्रिखा की पीठ ने 18 सितंबर 2026 को फैसला सुनाते हुए कहा कि किसान के खाते से प्रीमियम काटने के बाद बैंक की जिम्मेदारी थी कि वह निर्धारित समय में पूरा विवरण पोर्टल पर अपलोड करे।

वहीं, बीमा कंपनी को भी तय अवधि में दस्तावेजों का सत्यापन कर किसी कमी की जानकारी संबंधित विभाग को देनी चाहिए थी। आयोग ने माना कि किसान का पोर्टल पर विवरण अपलोड करने की प्रक्रिया में कोई नियंत्रण नहीं था।

इसलिए बैंक और बीमा कंपनी की लापरवाही का खामियाजा किसान को नहीं भुगतना पड़ सकता। आयोग ने दोनों पक्षों को संयुक्त एवं अलग-अलग रूप से भुगतान के लिए जिम्मेदार ठहराया। आदेश का पालन नहीं करने पर उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 72 के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

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